सोमवार, 25 जुलाई 2011

खाली सा लगता है

क्यों सब कुछ खाली सा लगता है..
आंखे भरी है आँसुओ से फिर भी आँखो में शुन्यता
है ,

दिल है दर्द और ख़ुशियो से भरा..
फिर भी दिल वीरान लगता है..

बाहों में झूल रही है कितनों की बाते..

जिसे गले लगाकर हम फिरते है पूरा दिन..
फिर भी एक अकेलापन सा लगता है..

जब भी तलाशती हुं खुद को..कभी अकेले में..
तो वो अकेलापन जैसे घुटन सा लगता है..

छोड़ दिया है अब खुद की परेशानियों को सोचना..
दिन रात जैसे जिंदगी का सिर्फ आना जाना लगता है..

नीता कोटेचा..

6 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िंदगी को लेकर आपका मनन सही है
    "छोड़ दिया है अब खुद की परेशानियों को सोचना..
    दिन रात जैसे जिंदगी का सिर्फ आना जाना लगता है.."
    बहुत पते की बात कह दी आपने

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  2. bahut khoob sakhi neeta*aapne sach hi kaha*hai*
    फुरसत में कभी हम खुद से बात किया करते हैं ,
    सोचते हुए दिन से रात किया करते हैं ,
    ये दिल भूल ना जाए कहीं अपने ही वजूद को ,
    बस यही सोचकर हम ,
    दिल से दिल की मुलाक़ात लिया करते हैं **

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  3. बहुत सही लिखा है नीता ...ज़िन्दगी मैं अक्सर कितना कितना अकेलापन लगता है ..सब कुछ है पास फिर भी क्यों अकेला लगता है ....

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  4. ye akelapan door karne k liye hi to hota hai blog to sakhi kyu lagta hai fir akelapan?

    sunder srijan.

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  5. logo ke samandar me rah kar bhi kabhi kabhi lagta hai, koi nahi apna..........kitne nirih hain ham!!
    ye akelapan ....!

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सखियों आपके बोलों से ही रोशन होगा आ सखी का जहां... कमेंट मॉडरेशन के कारण हो सकता है कि आपका संदेश कुछ देरी से प्रकाशित हो, धैर्य रखना..