मंगलवार, 10 सितंबर 2013

शनिवार, 7 सितंबर 2013

muktak

कुछ समेट लियें हैं
कुछ अभी बाकी हैं
यादों के जर्जर घरौंदे से
विदा लेना अभी बाकी है ..

'घर'

दरअसल ..जिस 'घर' की खिड़कियाँ दरवाजे तुम खुला देख रहे हो ... ये संकेत है इस बात का कि अब ये 'घर' तुमसे बेख़ौफ़ हैं ...इस 'घर' के लिए अब तुम एक निरीह सूखे हुए वृक्ष मात्र हो ... अब तो बारिश में भीगकर .. धूप में झुलसकर परत दर परत बिखरने भी लगे हो ... दीमकों ने तुम्हें भीतर से खोखला भी कर दिया है ... हवा का एक हल्का झोंका कभी भी तुम्हें गिरा सकता है ... हलके,खोखले अगर तुम 'घर' पर गिर भी गए तब भी 'घर' की एक ईंट भी नहीं हिलेगी .....
(यूँ ही कुछ गुण-बुन लिया )

ghazal

हर पल हर दिन बिखर रहे हो 
तन्हाई से गुज़र रहे हो 

जिन वादों का दम भरते थे 
उन वादों से मुकर रहे हो

दुआ दिया करते थे जिनको
अब उनसे बेखबर रहे हो

ऊंचाई की सीढ़ी पर थे
उस सीढ़ी से उतर रहे हो

थक जाओगे तब लौटोगे
कर अनजाने सफ़र रहे हो

हासिल जो तुमको था शायद
खो अपना वो हुनर रहे हो

जिनकी नज़रों में थे ऊपर
उन नज़रों से उतर रहे हो

- शोभा मिश्रा