मंगलवार, 1 मई 2012


आज के इस दिवस पर एक पुरानी रचना
...........समर्पित है ....समस्त श्रमिकों को ...

'वह तोडती पत्थर' ---------'हमेशा प्रासंगिक'


धूल भरी दोपहरी ने 'वह तोडती पत्थर' याद दिला दी
बचपन में जो सिर्फ एक रचना थी, उसकी परिणति हकीकत में करा दी
हाँ मैं हताश ,परेशान बस की आस में थी
नज़दीक एक इमारत अपने पूर्ण होने , के इंतज़ार में थी
कुछ कामगार , अपनी रोज़ी -रोटी की तलाश में थे
बच्चों को धूप में सुला ,उनके भविष्य को संवारने के प्रयास में थे
हाथ , हाथौडी लिए पत्थर नज़र आते थे
आँखों में शाम के चूल्हे के, अंगार नज़र आते थे
सर पर ईंटे , एक नहीं कई थी
आँखें पेड़ के नीचे सोये ,नौनिहाल पर पसरी थी
बच्चे ने करवट ली और पाँव पसार दिए
मेहनती माँ के अधरों पर भी स्मिता ने झंडे गाढ़ दिए
हाथ और क़दमों में तेज़ी आ गयी ...
मस्तिष्क को शायद ख्वाब की कोई झलक पा गयी
हमेशा प्रासंगिक है ये, इसका अंत नहीं होई
कभी इलाहाबाद का पथ और कभी छोटी सी गली कोई

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