सोमवार, 18 जुलाई 2011

आभासी दुनिया से सच की जमीन पर कुछ पल

मुझे फेसबुक छोड़ने का गम कभी नहीं हुआ, मगर अपने ग्रुप से दूर होना इतना पीड़ादायी था कि तीन दिन तक गुमसुम रही। जोशीजी समझ गए, चौथे दिन सुबह बुलाकर आ सखी के ही रूप रंग का सुंदर ब्लॉग दिखाया। इसे देखकर मैं बच्चों कि तरह उछल पड़ी। मैं भाग्यशाली हूं कि सखियां मुझ पर विशवास करके इसमें शरीक भी हो रही है।
           हां, इतनी भाग्यशाली कि उसी आभासी दुनिया से एक सखी निकल कर  बड़े प्रेम से मुझसे मिलने मेरे घर आती है। यकीन नहीं होता। सेरोनिका सीमा व्यास जिससे मैं पहले कहीं नहीं मिली, का आने के पहले फोन आया कि बीकानेर आएगी कुलदेवी दर्शन को तो मिलने आएगी। सो मैं घर कि सफाई में लग गई। मेरे घर में यूं तो आम घरों कि तरह रोज ही  सफाई होती है जैसे फ्रिज में रखी मिठाई की सफाई, ठंडी हुई बोतलों से पानी कि सफाई, व्‍यवस्थित रखी चीजों कि सफाई, पर अभी तो सखी आ रही थी सो सफाई थोड़ी भिन्न थी, अगले रोज फोन आया हम बीकानेर पहुच चुके हैं,एड्रेस बताएं, मैंने कहा मौसम विभाग (घर के पास ) तक आ जाएं सामने से जोशी जी को लेने  भेज दूंगी। 
रायते की खातिर कॉलोनी की डेयरी से दही लाने जोशीजी को भेजा। कहा "जल्‍दी आना"। एक परफेक्‍ट पति की तरह जोशीजी जल्‍दी नहीं आए, पर सीमाजी का फोन आ गया कि "हम पहुंच गए हैं" आखिर कान्‍हे को अकेला छोड़ मैं ही सामने लेने पहुंची। देखा उनकी कार काफी दूर है और चिलचिलाती धूप और उमस भी तेज है।
पसीना पोंछती जोशीजी को कोस रही थी, तभी सीमाजी की कार को पार करके अपनी ओर आते हुए एक काली मोटरसाइकिल पर काला टीशर्ट पहने,  बैग को कंधे से कमर की ओर टेढ़ा डाले, एक गोरा युवक आ रहा है, बड़े इत्‍मीनान से गाड़ी चलाते हुए।
 कार धुंधली पड़ गई
युवक पर नजरें गड़ गई
थोड़ा और करीब आने पर
खीज से भर गई
आइला ये तो जोशीजी हैं।
देखकर लगा मानो उन्‍होंने कंधों पर गृहस्‍थी के बोझ को टेढ़ा लटका रखा है। खीज के साथ खुद पर आश्‍चर्य हो रहा था सोच कर कि नैन मटके कि बचपनी आदत गई नहीं क्या ?
अब कार दिखने लगी थी, हमने इशारा किया शायद माजरा भाँप लिया गया, कार हमारे पीछे आ रही थी घर के आगे पहले सीमा जी के दो  प्यारे बच्चो (एक बेटा और एक बेटी )को देखा फिर एक प्यारी मुस्कान वाली गोरी चिट्टी,  भूरी ,नहीं, नहीं शायद कत्थई आँखों वाली खूबसूरत बड़े आकार कि महिला को एकटक देख रही थी कि मेरे पास आकर प्यार से कहा "आपकी बिंदी खिसक गयी है "और उसे खुद ही हाथ बढा कर ठीक किया ,उसके बाद हम सहज थे ऐसे जैसे बरसो से एक दूसरे को जानते हो गर्मी में आये थे सब कोल्ड ड्रिंक देने पर सीमा जी ने मना कर दिया, जोशी जी ने मौके को भुनाया, रसोई में जाकर कोल्‍ड कॉफी खुद बनाकर लाए (उनको यह शौक काफी समय से चर्राया हुआ है)। बचे हुए दूध की थैली यूं ही रख दी। इसी बीच सीमाजी ने कान्‍हा से कहा कि तुम बड़े प्‍यारे हो मैं तुम्‍हे साथ ले जाउंगी। कान्‍हा ने पूछा वापस, तो सीमाजी के बच्‍चों ने चुटकी ली कि अरे तुम्‍हे हमारी मम्‍मी फेसबुक से वापस भेज देंगी।
            कुछ देर बाद बच्‍चों, पतियों और सखियों के अलग अलग ग्रुप बन गए। फिर हमने की असली वाली चुगलियां। आहा चुगलियां वो जो दिल को हल्‍का कर गई और हाजमे को दुरुस्‍त। खाना तैयार था, गर्म ताजा खिलाने की गरज से पूरियां तलने पहुंची। तो सीमाजी भी साथ में आ गई। और फिर हम दोनों मिलकर तल रही थीं काफी कुछ। सबने खाना खाया। बच्‍चों और सखियों के यहां भी अलग अलग ग्रुप बने। मीनू था - राजस्‍थान की प्रसिद्ध कैर सांगरी की सब्‍जी और फोगले का रायता (यह रेगिस्‍तानी खींप पर उगने वाले फूल होते हैं, इन्‍हें पानी में उबालकर दही में मिलाया जाता है), आलू की सब्‍जी, पूरियों के साथ बीकानेर के बीके स्‍कूल के कचौरी समोसे, भुजिया और दाल की बर्फियां। बच्‍चों को सबकुछ पसंद आया तो सीमाजी को केवल फोगले का रायता भाया। दीगर बात थी कि कमजोर स्‍वास्‍थ्‍य का असर कहीं से भी सीमाजी के व्‍यवहार में नजर नहीं आया। अन्‍यथा महिलाएं अपने स्‍वास्‍थ्‍य को अनदेखा कर केवल चिड़चिड़ाती नजर आती हैं।
           खाने के बाद सब समेट जोशीजी और व्‍यासजी की बातों के बीच हम भी धमक गईं। जोशीजी के व्‍यासजी की कुण्‍डली देखते समय सीमाजी व्‍यासजी की जो खिंचाई कर रही थी, उससे सभी के हंसते हंसते पेट में बल पड़ गए, सिवाय व्‍यासजी के। थोड़ी देर में व्‍यासजी ने चलने का आह्वाहन किया तो फिर मन भारी हो गया। एक बार फिर सखी से बिछड़ने की घड़ी आ रही थी। एक-दूसरे से फिर मिलने का वादा किया। सखी सीमा की लाई चॉकलेट ने कान्‍हा की जैसे लॉटरी लगा दी। मगर जब उन्‍होंने निकलने से पहले कान्‍हा से हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह चार कदम पीछे हट गया। उसे सीमाजी की ले जाने वाली बात याद आ गई थी। फिर भी प्‍यार करते हुए आगे बढ़ गई। एक दूसरे की आंखों में झांकते हुए कि "सखी कहीं भूल तो न जाओगी"।

14 टिप्‍पणियां:

  1. AAAAHAAAAA....DONO AAKAR KI SAKHIYA BEHAD PYARI HAI....LEKIN FOGLE KE RAITE AUR SAANGRI KE SAAG ME ATKI JAAN HAMARI HAI.....EESHWAR HI JANTA HAI...KI YE SAB KHANE KI..KAB MERI BAARI HAI.....!!!!!

    WAISE AAKAAR SAMJHANE KA PRAKAAR BEHAD PASAND AAYA.....!!!

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  2. kashhhhhhhhhh mai bhi aapse mil sakti..vo bhi din aayega...ye mulakat bahut achchi rahi ..hum mahesus kar pa rahe hai... aur dosto se milna to alag hi khushi hoti hai ji...

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  3. अपना ब्लाग यहां ब्लाग परिवार मे शामिल करवाये, ताकि आप को अधिक पाठक मिले...
    http://blogparivaar.blogspot.com/

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  4. \/\/[] \/\/
    kya mast milan raha hoga.....
    seema .... aap tabhee hamey bhool gayee thee naa ???
    bhavna bhavee

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  5. praveena tumhaari lekhni ka to jawaab nahi jis khoobsurati se tumne hamaari mulaakat ko prastut kiya hai ,shayad hi koi kar paaye*

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  6. स्वागत है वसुंधरा जी ,कुछ दिल की कहे ,कुछ दिल की सुने यहा

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  7. प्रवीना, कितना सुंदर चित्रण किया है मुलाकात का ... ना होते हुए भी यूँ लगा कि मैं भी वहीँ कहीं पास में ही थी ....दूर से चुपचाप तुम लोगों को देख रही थी .... और ये फोगले का रायता तो मैं भी एक दिन खाना चाहूंगी ...कभी सुना भी नहीं ये शब्द ...मगर तुमने बता दिया कि ये चीज़ आखिर है क्या ..... कभी तुम भी आओ इलाहाबाद ....

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  8. kya baat hai .Praveenaaa ji aap se bahut der se mulaakaat hui ..........par ham ab mitra ban gaye hain......bahut achcha lagaa aap se jud kar aur aapke vichar padh kar .........

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  9. यूँ तो आभासी कुछ भी नहीं है,और सोचो तो सब कुछ आभासी ही तो है.....इस जगह पर हम सब इतनी दूर-दूर हैं.....कि एक-दूसरे के चरित्र-चाल-मन को समझ नहीं पाते,मगर जहां भी समझ पाते हैं,वहीँ हमारा यह आभासी-सा प्रतीत होने वाला रिश्ता एक जीवन्तता में परिणत हो जाता है....कुछ भी आभासी नहीं लगता तब...हम जैसे एक-दूसरे के सामने ही बैठे हुआ करते हैं...बस हमारी भावनाओं में ईमानदारी होनी चाहिए....यूँ तो आभासी कुछ भी नहीं है,और सोचो तो सब कुछ आभासी ही तो है.....!!
    वैसे आपने यह जो वर्णन किया है,वह भी तो आभासी ही है,उनके लिए,जो इसका हिस्सा नहीं है....मगर पढने पर ऐसा लगा कि....मैं भी यहीं कहीं हूँ....तो....फिर वही बात हो गयी ना...यूँ तो आभासी कुछ भी नहीं है,और सोचो तो सब कुछ आभासी ही तो है.....!!

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  10. आपकी टिप्पणी स्वीकृति के बाद दिखने लगेगी.......!!??

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  11. Kya vranan kiya hai aapne Praveenaji...mai to apne college ke dino me kho gayi...jab sari sakhiyan milti thi aur batein hi batein....nonstop chugli....

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सखियों आपके बोलों से ही रोशन होगा आ सखी का जहां... कमेंट मॉडरेशन के कारण हो सकता है कि आपका संदेश कुछ देरी से प्रकाशित हो, धैर्य रखना..