शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

मै मुस्कुराई हु..

सखी प्रवीणा


बिछड़ के तुझसे..
तेरे 
और करीब आई हु..
डूब के तेरी 
यादो के समंदर में..
कुछ हसीं लम्हे 
चुन के लाइ हु..
इन लम्हों में 
महसूस कर तूझे 
अपने साथ 
देखो ....
आज अरसे बाद
मै मुस्कुराई हु..!  कविता..

5 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आश्‍चर्यचकित हूं यह जानकर कि दिल से दिल की बात बिना किसी माध्‍यम कैसे पहुंच जाती है। मेरे भी दिल का यही हाल है..

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  2. मेरी प्यारी सखी..माना तुम हर बात में बहोत प्रवीण हों..लेकिन अहसासों की दुनिया के अपने माध्यम होते...जिसे अपने करीब जानते है..वो बिना कहे सूने..दिल से दिल की बात जान जाते है...अहसासों का दरिया हु मै...हर लहर में एक नया अहसास...जो महसूस कराएगा तुम्हे की मै हु तुम्हारे दिल के बहोत पास...

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  3. kavita ko muskarane ke liye kaha bahana dhundhna padta hai..har bat me vo khushi dhundh le leti hai aur ye hi bat uske pas se sikhne jaisi hai..bahut sahi kaha kavi...

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सखियों आपके बोलों से ही रोशन होगा आ सखी का जहां... कमेंट मॉडरेशन के कारण हो सकता है कि आपका संदेश कुछ देरी से प्रकाशित हो, धैर्य रखना..