शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

"कविता" पे कविता की.."कविता"...!!!



कितने तेरे रूप है कविता...
कितने सारे तेरे रंग...;
हर अहसास को कर आत्मसात
जीबन में पल पल चलती हों संग..!!

दिल से जो देखे..पढे और समझे..
कुछ भी नहीं तुझसे बेहतर..;
खुद को भूल के जीनेवाले..
कर देते अनदेखा तुझ को भी अक्सर..!!!

सागर सी गहराई तुझमे..
उचाईयां तेरी पर्वतो से बढ़कर..;
सुख,दुःख..दर्द ..मौन और आंसू..
तुझमे आते हर शब्द छन-छनकर..!!

कवी ह्रदय की बन प्रियतमा..
तो कभी बन प्रेयसी की हलचल..
बन ममता मात- ह्रदय की..
जीती हों सब की साँसों में हर पल...!!! ...कविता राठी..

2 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा, कविता का यह रूप भी अलहदा है। कविता की कविता का सखियों की ओर से स्‍वागत है...

    उत्तर देंहटाएं

सखियों आपके बोलों से ही रोशन होगा आ सखी का जहां... कमेंट मॉडरेशन के कारण हो सकता है कि आपका संदेश कुछ देरी से प्रकाशित हो, धैर्य रखना..