सोमवार, 3 सितंबर 2018

मुक्त

जितना आसान होता है, 
ये कह देना कि 
जाओ मुक्त किया तुम्हें, 
उतना ही मुश्किल होता है, 
साल - दर - साल साथ 
निभाये गये लम्हों से मुक्त होना,
मुक्त होना उस एहसास से,
जहाँ दुनिया तुमसे शुरू होकर
तुमपर ही खत्म हो जाती है,
जहाँ सपने
तुम्हारे सपनों से मिलकर ही,
आकार लेते हैं,
तुम्हारे मुस्कुरा भर देने से,
खिल उठते हैं,
दिन, दोपहर, शाम,
तुम्हारा होना ही होता है,
जिन्दगी का होना,
'सच'
कितना आसान होता है ये कह देना,
जाओ मुक्त किया तुम्हें ... !!अनुश्री!!

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

बाजरे की रोटी

बाजरा रेगिस्तानी सूखे इलाको की पैदावार है छोटे गोल और  हरे रंग महीन दाने खाने में स्वादिष्ट होते है इन्हें अक्सर गाँवो में बड़े चाव से आटा पिसवा कर रोटी बना कर गुड़ के साथ खाया जाता है सर्दियों में बाजरी की रोटी बहुत गुणकारी होती है इसे खाने से शरीर में ऊर्जा लम्बे समय तक बनी रहती है ।

बाजरी की रोटी बनाने की विधि - बाजरी के आटे में लोच कम होता है इसीलिए कम पानी के साथ गोंदा जाना बेहतर रहता है अन्यथा आटा गीला ज्यादा हो जाय तो रोटी बनाने में कठिनाई आती है इसे हाथ से थाप दे देकर बनाया जाता है रोटी बनाते समय हाथो को निश्चित शेप के साथ रोटी पर दबाव बनाते जाए तो रोटी आसानी से बन जाती है थोड़े अभ्यास के बाद बाजरे की रोटी बनने लगती है रोटी के शेप में आने के बाद इसे चूल्हे पर तवा रख कर  सेंक सकते है गैस पर भी इसे बनाया जा सकता है रोटी के  सिकते समय रंग बदलने के साथ सावधानी पूर्वक इसे पलट दे और रोटी में कडा पन आ जाने के बाद तवा हटा कर सीधे चूल्हे पर रख कर चिमटे की सहायता से सेक ले, रोटी सिक जाने पर इस पर देशी और गुड़ के साथ लगा कर खाये या सांगरी केर की राजस्थानी साग के साथ इसे खाया जा सकता है ।

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

' स्त्री'

' स्त्री'
नहीं निकल पायी कभी,
'देह' के दायरे से बाहर
चाहे वो सलवार कुर्ते में,
शरमाती, सकुचाती सी हो
चाहे, इस सो कॉल्ड
मॉडर्न सोसाइटी की
खुले विचारों वाली,
कुछ  नजरें बेंध ही देती हैं
उनके जिस्म का पोर पोर,
भरी भीड़ में भी.

'कभी देखना'
किसी गश खा कर गिरती हुई
लड़की को,
'देखना'
कैसे टूटते हैं, 'मर्द'
उसकी मदद को,
और टटोलते हैं,
'उसके' जिस्म का 'कोना - कोना' ।

'देखना'
किसी बस या ट्रेन में
भरी भीड़ में चढ़ती हुई
'स्त्री' को,
और ये भी देखना,
'कैसे' अचानक दो हाथ
उसके उभारों पर दबाव बना,
गायब हो जाते हैं.

देखना बगल की  सीट पर बैठे
मुसाफिर के हाथ नींद में कैसे
अपनी महिला सहयात्री के
नितम्बों पर गिरते हैं।

जवान होती लड़कियों को
गले लगा कर
उनके उभारों पर हाथ फेरते
रिश्तेदारों को देखना,

और फिर कहना,
क्या अब भी है 'स्त्री'
देह के दायरे से बाहर।