रविवार, 9 फ़रवरी 2020

फूलदेई त्यौहार

फूलदेई त्यौहार "उत्तरांचल"

उत्तराखंड अपनी खूबसूरत वादियों ,ऊंचे ऊंचे पहाड़,पर्वतों , झीलों , नदियों व शानदार हिमालय के दर्शन के लिए जाना जाता है ।और यहां पर प्रकृति द्वारा बिना कहे दिए जाने वाले अनगिनत उपहारों के बदले प्रकृति को धन्यवाद देने हेतु अनेक त्यौहार मनाए जाते हैं ।उनमें से एक त्यौहार है फूलदेई त्यौहार या फूल संक्रांति।‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का संदेश देती है यह परंपरा।

फूलदेई त्यौहार प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की संक्रांति को मनाया जाता है ।यह चैत्र मास का प्रथम दिन माना जाता है।और हिंदू परंपरा के अनुसार इस दिन से हिंदू नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।यह त्यौहार नववर्ष के स्वागत  के लिए ही मनाया जाता है।इस वक्त उत्तराखंड के पहाड़ों में अनेक प्रकार के सुंदर फूल खिलते हैं।

पूरे पहाड़ का आंचल रंग-बिरंगे फूलों से सज जाता है।और बसंत के इस मौसम में फ्योली, खुमानी, पुलम, आडू , बुरांश ,भिटोरे आदि  के फूल हर कहीं खिले हुए नजर आ जाते हैं।जहां पहाड़ बुरांश के सुर्ख लाल चटक फूलों से सजे रहते हैं वही घर आंगन में लगे आडू, खुमानी के पेड़ों में सफेद व हल्के बैंगनी रंग के फूल खिले रहते हैं।
चैत्र मास की संक्रांति के दिन या चैत्र माह के प्रथम दिन छोटे–छोटे बच्चे जंगलों या खेतों से फूल तोड़ कर लाते हैं।और उन फूलों को एक टोकरी में या थाली में सजा कर सबसे पहले अपने देवी देवताओं को अर्पित करते हैं।
उसके बाद वो पूरे गांव में घूम -घूम कर गांव की हर देहली( दरवाजे) पर जाते हैं ।और उन फूलों से दरवाजों (देहली) का पूजन करते हैं।यानी दरवाजों में उन सुंदर रंग बिरंगे फूलों को बिखेर देते हैं।साथ ही साथ एक सुंदर सा लोक गीत भी गाते हैं।

फूल देई  ……छम्मा देई

देणी द्वार……. भर  भकार ……

फूल देई  ……छम्मा देई।

उसके बाद घर के मालिक द्वारा इन बच्चों को चावल, गुड़ ,भेंट या अन्य उपहार दिए जाते हैं। जिससे ये छोटे-छोटे बच्चे बहुत प्रसन्न होते हैं ।इसी तरह गांव के हर दरवाजे का पूजन कर उपहार पाते हैं।यह प्रकृति और इंसानों के बीच मधुर संबंध को दर्शाता है।जहां प्रकृति बिना कुछ कहे इंसान को अनेक उपहारों से नवाज देती है।और बदले में प्रकृति का धन्यवाद उसी के दिए हुए इन प्राकृतिक रंग बिरंगी फूलों को देहरी में सजाकर किया जाता है।
शाम को तरह तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं ।मगर चावल से बनने वाला  सई ( सैया) विशेष एक तौर से बनाया जाता है।चावल के आटे को दही में मिलाया जाता है।फिर उसको लोहे की कढ़ाई में घी डालकर पकने तक भूना जाता है।उसके बाद उसमें स्वादानुसार चीनी व मेवे  डाले जाते हैं यह अत्यंत स्वादिष्ट और विशेष तौर से इस दिन खाया जाने वाला व्यंजन है।
इस साल जिनके बच्चे  हुये है उनकी विशेष टोकरी बनाई जाती है।सभी घरो से बच्चो को ढेर सारा आशीष पैसे व चावल मिलता। इस बार मेरे घर भी कानहा आएँ है तो मै भी इस बार नयी टोकरी बनाऊगी🌹🙏
लेखिका, - भावना पांडे 

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