गुरुवार, 21 जुलाई 2011

मन में उठती है रोज़ ,एक उम्मीद एक नई आशा ,
दिन ढलने से पहले वक़्त पलट देता है पासा ,
वक़्त दे जाता है मौत ,हम रह जाते हैं मौन ,
बस यही सोचकर कि,
एक दिन मन उम्मीद कि विजय पताका फहराएगा ,
और उस दिन हम जीत जायेंगे ,
और वक़्त हमसे हार जाएगा ,
वक़्त से जीतने का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है ,
अब भी मुझे अपने मन कि हार से इनकार है ,
मन में उठती है रोज़ एक उम्मीद एक नई आशा ****

5 टिप्‍पणियां:

  1. sakhi seema....
    wakt k aage nahi chalti apne ek..
    ugta hua suraj lata hai sang apne ummidein anek..
    jeet haar ki kaha koi baat hai....
    baaki khushiyo se jeena..ummido ko sakaar karna apne haath hai..

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  2. अब भी मुझे अपने मन कि हार से इनकार है ,

    bahot achchi bat kahi seema ji

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  3. मन के हारे हार है ,मन के जीते जीत आपकी रचना यह अनुपम संदेश दे रही है सीमा जी

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  4. Robert Frost ki kuch lines yaad a gayi seema.

    The woods are lovely, dark, and deep, But I have promises to keep, And miles to go before I sleep, And miles to go before I sleep...

    ye meri all time favourite hain..

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सखियों आपके बोलों से ही रोशन होगा आ सखी का जहां... कमेंट मॉडरेशन के कारण हो सकता है कि आपका संदेश कुछ देरी से प्रकाशित हो, धैर्य रखना..