शनिवार, 29 दिसंबर 2012

'दामिनी'

'दामिनी' 
'तुम' चली गयी, 
जाना ही था तुम्हे, 
रुक भी जाती तो क्या? 
कहाँ जी पाती 'तुम' 
अपनी जिंदगी 'फिर से' , 
कहाँ से लाती जीने की 
वही चाह, 
वही उमंग, 
और सच कहूँ न , 
तो तुम्हारी मौत का मातम मनाता,
रोता पीटता ये समाज ही
तुम्हे जीने नहीं देता,
हर औरत के लिए तुम
'बेहया'
से ज्यादा कुछ नहीं होती,
और मर्दों का कहना ही क्या
'उन्हें तो एक नया मसाला मिल जाता,
जिस पर वो रिसर्च करते'
इससे ज्यादा कुछ भी नहीं होना था तुम्हारा,
तुम्हारा मुस्कुराना, हँसना ,
खिलखिलाना सब
खटकता लोगों को,
तब यही लोग तुम्हे
'बदचलन' का तमगा देते,
कहाँ निकल पाती
'तुम'
अपने जिस्म के लिजलीजेपन से बाहर,
या यूँ कहूँ की कहाँ निकलने देता
कोई तुम्हे तुम्हारे अतीत से बाहर,
कौन बनता तुम्हारी राह का 'हमसफ़र',
कोई नहीं,
'कोई भी नहीं',
माना की ये आंसू सच्चे हैं,
लेकिन ये तुम्हारी 'मौत' के आंसूं हैं,
तुम्हारे 'जिन्दा न रहने' के नहीं ...

!!अनु!!


ANITA MAURYA 

6 टिप्‍पणियां:

  1. दामिनी सबके दिलों में एक आग छोड़ कर चली गई :)

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  2. अपने जिस्म के लिजलीजेपन से बाहर,
    या यूँ कहूँ की कहाँ निकलने देता
    कोई तुम्हे तुम्हारे अतीत से बाहर,
    कौन बनता तुम्हारी राह का 'हमसफ़र',
    कोई नहीं,
    'कोई भी नहीं',
    माना की ये आंसू सच्चे हैं,
    लेकिन ये तुम्हारी 'मौत' के आंसूं हैं,
    तुम्हारे 'जिन्दा न रहने' के नहीं ...

    sahi kaha hai aapne


    हो सके तो इस ब्लॉग पर भी पधारे

    पोस्ट
    Gift- Every Second of My life.

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  3. मार्मिक चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  4. क्या खूब कहा आपने वहा वहा क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
    मेरी नई रचना
    प्रेमविरह
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ !
    सादर

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

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  6. कहाँ से लाती जीने की
    वही चाह,
    वही उमंग,
    और सच कहूँ न ,
    तो तुम्हारी मौत का मातम मनाता,
    रोता पीटता ये समाज ही
    तुम्हे जीने नहीं देता,..........
    ufffffff!!!

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सखियों आपके बोलों से ही रोशन होगा आ सखी का जहां... कमेंट मॉडरेशन के कारण हो सकता है कि आपका संदेश कुछ देरी से प्रकाशित हो, धैर्य रखना..