मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

' स्त्री'

' स्त्री'
नहीं निकल पायी कभी,
'देह' के दायरे से बाहर
चाहे वो सलवार कुर्ते में,
शरमाती, सकुचाती सी हो
चाहे, इस सो कॉल्ड
मॉडर्न सोसाइटी की
खुले विचारों वाली,
कुछ  नजरें बेंध ही देती हैं
उनके जिस्म का पोर पोर,
भरी भीड़ में भी.

'कभी देखना'
किसी गश खा कर गिरती हुई
लड़की को,
'देखना'
कैसे टूटते हैं, 'मर्द'
उसकी मदद को,
और टटोलते हैं,
'उसके' जिस्म का 'कोना - कोना' ।

'देखना'
किसी बस या ट्रेन में
भरी भीड़ में चढ़ती हुई
'स्त्री' को,
और ये भी देखना,
'कैसे' अचानक दो हाथ
उसके उभारों पर दबाव बना,
गायब हो जाते हैं.

देखना बगल की  सीट पर बैठे
मुसाफिर के हाथ नींद में कैसे
अपनी महिला सहयात्री के
नितम्बों पर गिरते हैं।

जवान होती लड़कियों को
गले लगा कर
उनके उभारों पर हाथ फेरते
रिश्तेदारों को देखना,

और फिर कहना,
क्या अब भी है 'स्त्री'
देह के दायरे से बाहर। 

रविवार, 24 नवंबर 2013

Rhythm: सपने झूठे होते हैं सुबह के.........

Rhythm: सपने झूठे होते हैं सुबह के.........: माँ !!  रात मैंने एक सपना देखा  तुम हो !! आँगन में सोयी सी  और पास तेरे एक सफ़ेद कपडे में बैठी  औरत जोरो से हंस रही हैं बेहताशा  औ...

आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

सोमवार, 11 नवंबर 2013

Abhilasha : 13 नवंबर: लक्ष्मी कृपा पाने का एक और दिन, करिए इन में से कोई 5 काम...साभार दैनिक भास्कर . कॉम

Abhilasha : 13 नवंबर: लक्ष्मी कृपा पाने का एक और दिन, करिए इन में से कोई 5 काम...साभार दैनिक भास्कर . कॉम

13 नवंबर: लक्ष्मी कृपा पाने का एक और दिन, करिए इन में से कोई 5 काम...साभार दैनिक भास्कर . कॉम
कार्तिक माह की अमावस्या यानी दीपावली के बाद लक्ष्मी कृपा दिलाने वाला एक और खास दिन आ रहा है। यह दिन है बुधवार, 13 नवंबर 2013. कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को देवउठनी एकादशी या देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी से महालक्ष्मी के स्वामी यानी भगवान विष्णु पुन: जागते हैं।
इसके पूर्व आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्रीहरि शयन करते हैं और चार माह बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुन: जागते हैं। श्री विष्णु के शयन काल में सभी मांगलिक और विवाह आदि कार्य वर्जित रहते हैं।
भगवान विष्णु के जागने का दिन होने की वजह से य यह बुधवार काफी खास है, इस दिन कुछ उपाय कर लिए जाए तो महालक्ष्मी की कृपा भी बहुत जल्द प्राप्त हो जाती है।
इस बुधवार से सभी मांगलिक कार्य पुन: प्रारंभ हो जाएंगे।

शास्त्रों के अनुसार जो लोग इस एकादशी पर व्रत रखते हैं उनके सभी पाप नष्ट होते हैं और महालक्ष्मी की प्रसन्न प्राप्त होती है।

- देवउठनी एकादशी पर तुलसी और शालिग्राम का विवाह रचाया जाता है। जो भी लोग इस परंपरा का निर्वाह करते हैं उनके घर में स्थाई लक्ष्मी वास करती हैं और जीवनभर धन-दौलत की कोई कमी नहीं होती है। यदि आप तुलसी विवाह नहीं रचा सकते हैं तो कम से कम तुलसी का विशेष पूजन अवश्य करना चाहिए।

- यदि आप चाहे तो इस एकादशी पर व्रत भी रख सकते हैं। व्रत करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु के साथ ही महालक्ष्मी की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
व्रत रखने वाले व्यक्ति को दशमी तिथि यानी मंगलवार से ही शुद्ध-सात्विक भोजन करना चाहिए। इसके बाद एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर विष्णु एवं लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। भगवान को तुलसी के पत्ते भी चढ़ाएं। द्वादशी तिथि यानी गुरुवार के दिन सुबह विष्णु पूजा के बाद गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं। इसके बाद स्वयं भी भोजन करें।

एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और तांबे के लोटे में जल लें और उसमें लाल मिर्ची के बीज डालकर सूर्य को अर्पित करें। इस उपाय से आपको मनचाहे स्थान पर प्रमोशन और ट्रांसफर मिलेगा। यह उपाय नियमित रूप से करना चाहिए।

किसी ऐसे शिव मंदिर में जाएं जो श्मशान में स्थित हो। उस मंदिर में शिवलिंग पर दूध, जल आदि अर्पित करें। दीपक लगाएं। इस उपाय स्थाई लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- इस दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तुलसी के पत्तों की माला बनाएं और इसे महालक्ष्मी को अर्पित करें। ऐसा करने से धन में वृद्धि होगी।

- एकादशी की शाम को किसी मंदिर में एक सुपारी और तांबे का लोटा रख आएं। इसके साथ ही कुछ दक्षिणा भी रखें। इस उपाय से भी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
- इस दिन यदि संभव हो सके तो किसी किन्नर से उसकी खुशी से एक रुपया लें और इस सिक्के को अपने पर्स में रखें। बरकत बनी रहेगी।

- एकादशी की रात में लक्ष्मी और कुबेर देव का पूजन करें और यहां दिए एक मंत्र का जप कम से कम 108 बार करें।
मंत्र: ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रववाय, धन-धान्यधिपतये धन-धान्य समृद्धि मम देहि दापय स्वाहा।

रात को सोने से पहले किसी चौराहे पर तेल का दीपक जलाएं और घर लौटकर आ जाएं। ध्यान रखें पीछे पलटकर न देखें।
- किसी शिव मंदिर जाएं और वहां शिवलिंग पर अक्षत यानी चावल चढ़ाएं। ध्यान रहें सभी चावल पूर्ण होने चाहिए। खंडित चावल शिवलिंग पर चढ़ाना नहीं चाहिए।

प्रतिदिन पूजन के बाद घर के सभी कमरों में शंख और घंटी बजाना चाहिए। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता बाहर चली जाती है। मां लक्ष्मी घर में आती हैं।
- घर में लक्ष्मी को आमंत्रित करने के साथ ही उन्हें सहेज कर रखने के जतन करना भी महत्वपूर्ण है। इसलिए, नकदी और गहने-जेवरात की अलमारियां दक्षिण या पश्चिम की दीवारों पर हों और उत्तर या पूर्व की ओर खुलें। ख्याल रहे, इन अलमारियों पर दर्पण न लगा हो।

- लक्ष्मी, भगवान नारायण की पत्नी हैं और नारायण को अत्यंत प्रिय भी हैं। उनकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई है। शंख, मोती, सीप, कौड़ी भी समुद्र से प्राप्त होने के कारण नारायण को प्रिय हैं। अत: लक्ष्मी पूजन में समुद्र से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग अधिक किया जाता है। अत: जब भी लक्ष्मी पूजन करें ये चीजें जरूर रखें। पूजन के बाद इन चीजों को धन स्थान पर स्थापित करने से धन वृद्धि होती है।

इस दिन लक्ष्मी-विष्णु के बाद प्रमुख द्वार पर लक्ष्मी के गृहप्रवेश करते हुए चरण स्थापित करें।
- श्रीयंत्र, कनकधारा यंत्र, कुबेर यंत्र को सिद्ध कराकर पूजा स्थान पर या तिजोरी में रखा जाता है।

- दक्षिणावर्ती शंख के पूजन व स्थापना से भी धनागमन और सुख प्राप्ति का लोकविश्वास है।
- लक्ष्मी के साथ 11 कौडिय़ों की पूजा कर उन्हें पूजास्थल, तिजोरी एवं व्यवसाय स्थल पर रखना शुभ-समृद्धि दायक माना जाता है।

इस दिन आंकड़े के गणेश की पूजा व स्थापना से सम्पन्नता का आशीष मिलता है।
- लक्ष्मी पूजन में एकाक्षी नारियल या समुद्री नारियल की पूजा करने एवं तिजोरी में इसे रखने से घाटा नहीं होगा एवं समृद्धि आएगी।

एकादशी की रात्रि में रामरक्षा स्तोत्र का पाठ व अनुष्ठान करने से सफलता एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है।
- रात्रि में लक्ष्मी पूजन करें और उस समय कमल के पुष्प अर्पित करें और कमल गट्टे की माला से लक्ष्मी मंत्र ऊँ महालक्ष्मयै नम: का जप करें। इससे देवी लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त होती है।

यह पोस्ट दैनिक भास्कर .कॉम से कॉपी की गयी हैं

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

फरगुदिया : स्त्री जीवन और साहित्य---------------------------...

फरगुदिया : स्त्री जीवन और साहित्य
---------------------------...
: स्त्री जीवन और साहित्य --------------------------- " 'साहित्य' शब्द का व्यवहार नया नहीं है। बहुत पुराने जमान...

शनिवार, 7 सितंबर 2013

muktak

कुछ समेट लियें हैं
कुछ अभी बाकी हैं
यादों के जर्जर घरौंदे से
विदा लेना अभी बाकी है ..

'घर'

दरअसल ..जिस 'घर' की खिड़कियाँ दरवाजे तुम खुला देख रहे हो ... ये संकेत है इस बात का कि अब ये 'घर' तुमसे बेख़ौफ़ हैं ...इस 'घर' के लिए अब तुम एक निरीह सूखे हुए वृक्ष मात्र हो ... अब तो बारिश में भीगकर .. धूप में झुलसकर परत दर परत बिखरने भी लगे हो ... दीमकों ने तुम्हें भीतर से खोखला भी कर दिया है ... हवा का एक हल्का झोंका कभी भी तुम्हें गिरा सकता है ... हलके,खोखले अगर तुम 'घर' पर गिर भी गए तब भी 'घर' की एक ईंट भी नहीं हिलेगी .....
(यूँ ही कुछ गुण-बुन लिया )

ghazal

हर पल हर दिन बिखर रहे हो 
तन्हाई से गुज़र रहे हो 

जिन वादों का दम भरते थे 
उन वादों से मुकर रहे हो

दुआ दिया करते थे जिनको
अब उनसे बेखबर रहे हो

ऊंचाई की सीढ़ी पर थे
उस सीढ़ी से उतर रहे हो

थक जाओगे तब लौटोगे
कर अनजाने सफ़र रहे हो

हासिल जो तुमको था शायद
खो अपना वो हुनर रहे हो

जिनकी नज़रों में थे ऊपर
उन नज़रों से उतर रहे हो

- शोभा मिश्रा

शनिवार, 31 अगस्त 2013

औरत

अस्मत जो लुटी तो तुझको 
बेहया कहा गया, 
मर्जी से बिकी तो नाम 
वेश्या रखा गया,
हर बार सलीब पर, 
औरत को धरा गया ...

बेटे के स्थान पर,
जब जन्मी है बेटी, 
या फिर औलाद बिन, 
सुनी हो तेरी गोदी,
कदम कदम पर अपशकुनी
और बाँझ कहा गया,

जब भी तेरा दामन फैला,
घर के दाग छुपाने को ,
जब भी तुमने त्याग किये थे ,
हर दिल में बस जाने को,
इक इक प्यार और त्याग
को 'फ़र्ज़' कहा गया,

पंख पसारे आसमान को,
जब जब छूना चाहा,
रंग बिरंगे सपनों को,
हकीकत करना चाहा,
तू अबला है तेरी क्या,
औकात कहा गया ...
हर बार सलीब पर,
औरत को धरा गया .!!ANU!!

शनिवार, 13 जुलाई 2013

 

 

 

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....

 

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....

 

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....

 

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....

 

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....

 

बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....
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बदल गया माँ होने का अर्थ

कहाँ गया वो सामर्थ्य ?



देखती थी माँ की गोद के लिये

मचलते हुए भाइयों को

देखती हूँ माँ कि जिम्मेदारियों को

ठेलते हुए भाइयों को ......



कैसे जान लेती थी वो

सबके मन की बात अनकही

आज उसके मन की बात

किसी को जानने की फ़िक्र ही नहीं ......



थोड़े में भी जाने कैसे

उसने रखा सबका ख्याल

कृशकाय हुई आज उसका

कोई पूछे दिल का हाल



ज्यादा की तो चाहत ही नहीं

बस थोड़ा सा दे दो सम्मान

मृग- मारीचिका से मोह में घिर कर

मत करो उस माँ का अपमान



उसका सारा समय तुम्हारा

प्रेम समग्र तुम्हारे लिये

मत तरसाओ बूढ़े कानों को

प्यार भरे बोलों के लिये ....



एक बार बेटा बन कर

देखो धुंधली आँखों को

आज ज़रुरत है तुम्हारी

उसकी कमज़ोर बाँहों को ....



गोद में सिर रख कर देखो

आज भी सुकून पाओगे

लेने देने के व्यापारी

इसमें भी कुछ पाओगे .....



जब अपने बच्चे दुत्कारेंगे

तब उसकी व्यथा समझ पाओगे

चली गयी जो एक बार तो फिर

ढूँढते रह जाओगे ....



एक बार वो चली गयी तो

कुछ नहीं कर पाओगे .....

एक बार जो चली गयी तो

बस रोते ही रह जाओगे .....