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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

गणेश चतुर्थी

शनिवार सखी प्रतियोगिता
# त्योहार#  दिवस# प्रतियोगिता

  # गणेश चतुर्थी#
 नमस्कार  सखियों अपने भारत में इतने सारे त्यौहार देखे हैं उनमें से एक हैं गणेश चतुर्थी गणेश चतुर्थी इसलिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था इन्हें ज्ञान बुद्धि धर्म का बहुत ही ज्यादा मान्यवर देवता माना गया है गणेश गणेश की उपासना करने से सारे काम सफल हो जाते हैं और कहते हैं गणेश की अपनी माता के बहुत चाहते थे गणेश जी का जन्म माता ने शरीर पर लगाई उत्तम से हुआ माता पार्वती ने अपने शरीर पर लेप लगाया था उस लेप को हटाने पर भगवान गणेश का सृजन हुआ कहते हैं कि तब से गणेश चतुर्थी मनाते हैं माता पार्वती नहाने के लिए गई थी उन्होंने गणेश को कहा दरवाजे पर रुके निगरानी इतने में भगवान शंकर आ गए भगवान शंकर ने कहा वह अंदर जाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें पार्वती से बात करनी है गणेश ने उन्हें इनकार कर दिया क्योंकि पार्वती ने उसे कहा था निगरानी रखने के लिए और कोई अंदर ना आए लेकिन भगवान शंकर को ना जाने पर भगवान शंकर को क्रोध आ गया और भगवान श्री गणेश का सिर काट दिया सबसे पहले गणेश चतुर्थी छत्रपति शिवाजी ने मेरठ में मनाई थी कहते हैं गणेश चतुर्थी की शुरुआत की उन्होंने ही सबसे पहले की थी भगवान गणेश पूजनीय माने जाते हैं भगवान गणेश के रोकने पर श्री जी ने उनका सिर काट दिया उनको क्रोधित होकर पार्वती ने काली का रूप धारण कर लिया शिव शंकर ने जब उनका भयंकर रूप देखा तो उन्होंने इस बात को बड़े ध्यान से सुना तब उन्हें पता चला इसमें गणेश की कोई गलती नहीं है तो उन्होंने अपने परिजनों से कहा आप उस बच्चे का सर लेकर आए जिसका सिर दक्षिण की तरफ मुंह करके सोया हो और उसकी मां उसकी तरफ पीठ करके बैठी हूं सारे जन गए उन्हें हथनी का बच्चा मिला उसकी मां उसकी तरफ पीठ करके बैठी हुई थी हथिनी के बच्चे को घर ले आए और गणेश के धड़ पर लगा दिया पुनर्जीवन हुआ और कहते हैं इसी दिन को पूरे धूमधाम से महाराज ने गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है और हम भी घर पर गणेश जी को लाते हैं और 10 दिन तक उन्हें विराज कर उनकी पूजा अर्चना करते हैं भोग लगाते हैं और बहुत आनंद करते हैं और हर साल गणेश चतुर्थी का हमें इंतजार रहता है बच्चे भी बहुत खुश होते हैं गणेश जी की आरती गाकर तरह तरह के पकवान बनाते हैं लड्डू पेड़े का भोग लगाते हैं बोलो गणपति बप्पा मोरिया मंगल मूर्ति मोरिया
लेखिका- सोनू आशीष

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया

हमारे राजस्थान में अक्षय तृतीया 
हम फलोदी वाले आखा तीज बोलते हैं 😃

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।  वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई ।

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ , ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। उस के बाद फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है, ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन साबूत अनाज  अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, सोने का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

इस तयौहार में साबुत अनाज का खाना बनता है 
ओखली और मूसल की सहायता से गेहूं को कुटते है जब तक कि गेहूं का छिलका उतरने न  लग जाए ।।
गेहूं मूँग का खीच और ग्वार फली बडी की सब्जी और दही का रायता बनाया जाता है  ।।
ये त्यौहार वैशाख शुक्ल द्वितीया और तृतीया दो दिन मनाया जाता है।।
सभी एक दूसरे के घर खीच खाने जाते है,  और पतंग भी उडाई जाती है ।।
घर के पुरूष छत पर पतंग बाजी करते हैं  ,, मे भी शादी के पहले तक पतंग बाजी करती थी,  सभी लोग मुझ से कहते की तूम क्यो लडको की तरह पतंग बाजी करती है ।।

मे पतंग बाजी मे लडको को भी पीछे छोड़ दिया करती थी 😜
आसमान में  रंग बिरंगी पतंगो से भरा हुआ होता है 

लेखिका- माधुरी गुचिया

गुड़ी पड़वा

गुड़ी पड़वा
आज का विषय बहुत ही रोचक है। हमारी सनातन संस्कृति को और अच्छी तरह जानने के लिए उपयोगी भी है।वैसे तो हमारे भारतवर्ष में हर दिन त्यौहार ही होता है पर कुछ विशेष दिन होते हैं जो सदियों से मनाए जा रहे हैं। हमारे हिन्दू नववर्ष का पहला दिन यानि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा होता है।इस दिन विक्रम संवत्सर का आरंभ माना जाता है।कहते हैं इसी दिन ब्रम्हा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।इसी दिन चैत्र नवरात्रि आरंभ होते हैं।
इस दिन को वर्ष प्रतिपदा नवसंवत्सर या गुड़ी पाड़वा भी कहते हैं।गुड़ी का अर्थ "विजय पताका"होता है।मान्यता है कि शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से शकों का पराभव किया था।इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है।चैत्र के महीने में ही वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती है।
महाराष्ट्र में यह पर्व गुड़ी पाड़वा के रूप में मनाया जाता है।इस दिन महाराष्ट्र के प्रत्येक घर के द्वार पर या छत पर गुड़ी उभारकर  उसकी पूजा की जाती है।इसके लिए बांस की लम्बी काठी के एक छोर पर जरी का लाल या केसरिया कपड़ा लगाते हैं। फिर उस पर शक्कर के बतासों की माला,आम के पत्ते,नीम के पत्ते, फूलों का हार ये सब बांधकर उस पर तांबे का कलश उल्टा रखते हैं। फिर ये काठी दरवाजे पर या छत पर बांध देते हैं।तांबे का कलश उल्टा लगाने के पीछे मान्यता है कि ब्रम्हांड की सारी सकारात्मक ऊर्जा को ये तांबे का कलश आकर्षित करके पृथ्वी में भेजता है। अर्थात घर की नींव में सकारात्मक ऊर्जा जाने से और मजबूत होती है।इसकी विधिवत पूजा कर नैवेद्य अर्पित किया जाता है।घर के आंगन में रंगोली बनाते हैं।द्वार पर आम के पत्ते और हजारे के फूलों की बंदनवार लगाते हैं।ये सभी कार्य सूर्योदय के तुरंत बाद में किए जाते हैं।संध्या समय सूर्यास्त पूर्व ही ये गुड़ी उतारकर प्रसाद सबको बांट देते हैं।
नैवेद्य के लिए पूरण पोळी बनाते हैं जिसमें चना दाल,गुड़,नमक,नीम के फूल,इमली और कच्चा आम होता है।
गुड़ मिठास के लिए,नीम के फूल कड़वाहट के लिए,इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक होता है।आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है पर महाराष्ट्र में इसी दिन से खाया जाता है।यह दिन वर्ष के साढ़े तीन मुहुर्त में से एक मुहुर्त भी माना जाता है।इस दिन कोई भी शुभ कार्य शुरू करें तो उसका फल बहुत बढ़िया मिलता है।
तो सखियों ऐसा देश है मेरा जहां हर उत्सव के पीछे एक कहानी है। मैं हूं तो मारवाड़ी पर विवाह के बाद महाराष्ट्र में आ गई तो यहां के उत्सव यहीं के अनुसार मनाती हूं।
लेखिका- भारती पँचारिया शर्मा

बच्छ बारस ( राजस्थान)



बछ बारस।
इसे वत्स द्वादशी भी कहा जाता है।यह पूजन अपने बेटे की लंबी आयु और उसके उज्जवल भविष्य के लिए कि या जाता है। हर वर्ष भाद्रपद में कृष्ण पक्ष की द्वादशी  को  मनाया जाता है।
इस पूजन में जिस गाय के बछड़ा हुआ हो उसी गाय और बछड़े की पूजा की जाती ह।पूजा में गौ और बछड़े दोनों के तिलक निकाल कर दोनों को अंकुरित मूंग, मोठ और बाजरी के आटे की बनी लोई खिलाई जाती ह और मौली,जल भी चढ़ाते ह और मंगल कामना की जाती ह फिर कहानी सुनते ह ।
इस व्रत में भैंस के दूध की ही चाय और दही खाया जाए जाता ह और मूंग मोठ की सब्जी खाई जाती ह और बाजरी की रोटी ही खाते ह। गाय के दूध से बनी कोई भी खाने की चीज,चाकू से कटी कोई भी सब्जी ,गेहू के आटे की रोटी और लाल मिर्ची नही खाई जाती है।

लेखिका- संगीता व्यास

महापर्व

आदित्य होखी ना सहाय 😍😍🙏🙏
हमारे बिहार में छठ पर्व को" महापर्व" की संज्ञा दी गई है। चार दिन चलने वाले इस पवित्र व्रत में सुरज देव और छठी मइया की पुजा होती है। चार दिनों चलने वाले इस व्रत की शुरुआत कार्तिक मास की तृतीया तिथि से होती है। 
**😍🙏🙏पहले दिन" नहा खा"कहते हैं। इस दिन सुबह सुबह सारे घर कि सफाई करते हैं, फिर नहाने के बाद सुर्य देव को जल देते हैं। फिर अरवा चावल, चने की दाल और कददू की सब्जी बनाते हैं। घी में ही सब बनाया जाता है। 
**😍🙏🙏दुसरे दिन को खडना  कहते हैं। इस दिन सुबह से व्रती निर्जला रहतीं हैं। दोपहर में लकड़ी के चुल्हे पर गुड़ की खीर और रोटी या पूरी बनाई जाती है। गोधूलि बेला में केले के पते पर प्रसाद रखा जाता है, घी का दिया जलाते हैं और सुर्य देव को अर्पण करते हैं।। उसके बाद व्रती उस प्रसाद को ग्रहण करतीं हैं। फिर प्रसाद सब लोगों को दिया जाता है। छठ के गीत गाये जाते हैं । 
**😍🙏🙏तीसरे दिन को पहली अरग कहते हैं। व्रती निर्जला रहतीं हैं। गेहूं को धोकर पवित्रता से सुखाने के बाद पीसा लिया जाता है और गुड़ मेवा मिलाकर घी में तल कर ठेकुआ बनाया जाता है जो इस व्रत का मुख्य प्रसाद होता है।। सारे फलों को धोकर बांस से बनी टोकरी जिसे  दऊरा कहते हैं उसमें सजा दिया जाता है। सुप, परात, सब को फल ठेकुआ सिंदूर फूल से सजा दिया जाता है। शाम होने से पहले ही लोग नदियों तालाबों में जाते हैं। घाट सुंदर सजा होता है। अस्ताचलगामी सुर्य देव को अरग देने व्रती पानी में उतर जाती हैं और हाथों में पान का पता सिंदूर फूल लेकर सुप लेतीं हैं।। सब लोग दुध से धारा गिराते हैं। वरती पुकारे देव दुनो कर जोरीया  🙏🙏पुजन केरा बेरीया 🙏  अरग के रा बेरीया हो🙏🙏इन गीतों से वातावरण गुंज रहा होता है 😍
**😍🙏🙏चौथे और अंतिम दिन भोर में ही फिर से  दऊरा सजा गीत गाते हुए घाट पर जाते हैं।सुर्य उदय होने के पहले ही व्रती पानी में उतर जाती हैं और सुर्य देव का ध्यान करतीं हैं। उनके प्रकट होते ही अरग दिया जाता है। घाट पर घी के दिये जलाये जाते हैं। हवन किया जाता है।। सब को प्रसाद दिया जाता है। उसके बाद ही व्रती अपना व्रत खोलती हैं जिसे "पारन" कहते हैं। 
🙏🙏विशेषता 😍😍🙏🙏1 इस व्रत में बड़े छोटे का भेद भाव मिट जाता है। कोई छूवाछूत की भावना नही रहती। 
2 🙏🙏 ये लोक की पूजा है इसमें कोई मंत्र नहीं होते कोई पंडित की जरूरत नही होती।। इसके गीत ही सब कुछ होते हैं। ॐ सुर्य देवाय नमो 🙏🙏
3😍😍🙏🙏इस पुजा में सामाजिक सदभाव बढता है।।
लेखिका- अनु सिंह

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

गुड़ी पड़वा

गुड़ी पड़वा
 हमारी सनातन संस्कृति को और अच्छी तरह जानने के लिए यह त्यौहार उपयोगी  है।वैसे तो हमारे भारतवर्ष में हर दिन त्यौहार ही होता है पर कुछ विशेष दिन होते हैं जो सदियों से मनाए जा रहे हैं। हमारे हिन्दू नववर्ष का पहला दिन यानि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा होता है।इस दिन विक्रम संवत्सर का आरंभ माना जाता है।कहते हैं इसी दिन ब्रम्हा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।इसी दिन चैत्र नवरात्रि आरंभ होते हैं।
इस दिन को वर्ष प्रतिपदा नवसंवत्सर या गुड़ी पाड़वा भी कहते हैं।गुड़ी का अर्थ "विजय पताका"होता है।मान्यता है कि शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से शकों का पराभव किया था।इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है।चैत्र के महीने में ही वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती है।
महाराष्ट्र में यह पर्व गुड़ी पाड़वा के रूप में मनाया जाता है।इस दिन महाराष्ट्र के प्रत्येक घर के द्वार पर या छत पर गुड़ी उभारकर  उसकी पूजा की जाती है।इसके लिए बांस की लम्बी काठी के एक छोर पर जरी का लाल या केसरिया कपड़ा लगाते हैं। फिर उस पर शक्कर के बतासों की माला,आम के पत्ते,नीम के पत्ते, फूलों का हार ये सब बांधकर उस पर तांबे का कलश उल्टा रखते हैं। फिर ये काठी दरवाजे पर या छत पर बांध देते हैं।तांबे का कलश उल्टा लगाने के पीछे मान्यता है कि ब्रम्हांड की सारी सकारात्मक ऊर्जा को ये तांबे का कलश आकर्षित करके पृथ्वी में भेजता है। अर्थात घर की नींव में सकारात्मक ऊर्जा जाने से और मजबूत होती है।इसकी विधिवत पूजा कर नैवेद्य अर्पित किया जाता है।घर के आंगन में रंगोली बनाते हैं।द्वार पर आम के पत्ते और हजारे के फूलों की बंदनवार लगाते हैं।ये सभी कार्य सूर्योदय के तुरंत बाद में किए जाते हैं।संध्या समय सूर्यास्त पूर्व ही ये गुड़ी उतारकर प्रसाद सबको बांट देते हैं।
नैवेद्य के लिए पूरण पोळी बनाते हैं जिसमें चना दाल,गुड़,नमक,नीम के फूल,इमली और कच्चा आम होता है।
गुड़ मिठास के लिए,नीम के फूल कड़वाहट के लिए,इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक होता है।आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है पर महाराष्ट्र में इसी दिन से खाया जाता है।यह दिन वर्ष के साढ़े तीन मुहुर्त में से एक मुहुर्त भी माना जाता है।इस दिन कोई भी शुभ कार्य शुरू करें तो उसका फल बहुत बढ़िया मिलता है।
तो सखियों ऐसा देश है मेरा जहां हर उत्सव के पीछे एक कहानी है। मैं हूं तो मारवाड़ी पर विवाह के बाद महाराष्ट्र में आ गई तो यहां के उत्सव यहीं के अनुसार मनाती हूं।
लेखिका- भारती पंचारिया शर्मा
  

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

फूलदेई त्यौहार

फूलदेई त्यौहार "उत्तरांचल"

उत्तराखंड अपनी खूबसूरत वादियों ,ऊंचे ऊंचे पहाड़,पर्वतों , झीलों , नदियों व शानदार हिमालय के दर्शन के लिए जाना जाता है ।और यहां पर प्रकृति द्वारा बिना कहे दिए जाने वाले अनगिनत उपहारों के बदले प्रकृति को धन्यवाद देने हेतु अनेक त्यौहार मनाए जाते हैं ।उनमें से एक त्यौहार है फूलदेई त्यौहार या फूल संक्रांति।‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का संदेश देती है यह परंपरा।

फूलदेई त्यौहार प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की संक्रांति को मनाया जाता है ।यह चैत्र मास का प्रथम दिन माना जाता है।और हिंदू परंपरा के अनुसार इस दिन से हिंदू नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।यह त्यौहार नववर्ष के स्वागत  के लिए ही मनाया जाता है।इस वक्त उत्तराखंड के पहाड़ों में अनेक प्रकार के सुंदर फूल खिलते हैं।

पूरे पहाड़ का आंचल रंग-बिरंगे फूलों से सज जाता है।और बसंत के इस मौसम में फ्योली, खुमानी, पुलम, आडू , बुरांश ,भिटोरे आदि  के फूल हर कहीं खिले हुए नजर आ जाते हैं।जहां पहाड़ बुरांश के सुर्ख लाल चटक फूलों से सजे रहते हैं वही घर आंगन में लगे आडू, खुमानी के पेड़ों में सफेद व हल्के बैंगनी रंग के फूल खिले रहते हैं।
चैत्र मास की संक्रांति के दिन या चैत्र माह के प्रथम दिन छोटे–छोटे बच्चे जंगलों या खेतों से फूल तोड़ कर लाते हैं।और उन फूलों को एक टोकरी में या थाली में सजा कर सबसे पहले अपने देवी देवताओं को अर्पित करते हैं।
उसके बाद वो पूरे गांव में घूम -घूम कर गांव की हर देहली( दरवाजे) पर जाते हैं ।और उन फूलों से दरवाजों (देहली) का पूजन करते हैं।यानी दरवाजों में उन सुंदर रंग बिरंगे फूलों को बिखेर देते हैं।साथ ही साथ एक सुंदर सा लोक गीत भी गाते हैं।

फूल देई  ……छम्मा देई

देणी द्वार……. भर  भकार ……

फूल देई  ……छम्मा देई।

उसके बाद घर के मालिक द्वारा इन बच्चों को चावल, गुड़ ,भेंट या अन्य उपहार दिए जाते हैं। जिससे ये छोटे-छोटे बच्चे बहुत प्रसन्न होते हैं ।इसी तरह गांव के हर दरवाजे का पूजन कर उपहार पाते हैं।यह प्रकृति और इंसानों के बीच मधुर संबंध को दर्शाता है।जहां प्रकृति बिना कुछ कहे इंसान को अनेक उपहारों से नवाज देती है।और बदले में प्रकृति का धन्यवाद उसी के दिए हुए इन प्राकृतिक रंग बिरंगी फूलों को देहरी में सजाकर किया जाता है।
शाम को तरह तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं ।मगर चावल से बनने वाला  सई ( सैया) विशेष एक तौर से बनाया जाता है।चावल के आटे को दही में मिलाया जाता है।फिर उसको लोहे की कढ़ाई में घी डालकर पकने तक भूना जाता है।उसके बाद उसमें स्वादानुसार चीनी व मेवे  डाले जाते हैं यह अत्यंत स्वादिष्ट और विशेष तौर से इस दिन खाया जाने वाला व्यंजन है।
इस साल जिनके बच्चे  हुये है उनकी विशेष टोकरी बनाई जाती है।सभी घरो से बच्चो को ढेर सारा आशीष पैसे व चावल मिलता। इस बार मेरे घर भी कानहा आएँ है तो मै भी इस बार नयी टोकरी बनाऊगी🌹🙏
लेखिका, - भावना पांडे 

नवरात्रि

नवरात्रि

माँ दुर्गा की आराधना तो हम रोज ही ओर हर पल करते रहते  है लेकिन हमलोग  माँ दुर्गा की पूजा नवरात्रि 10  दिन चैत्र ओर आसविंन में विशेष रूप से घूम धाम से मनाते है 💃🏼💃🏼💃🏼💃🏼💃🏼💃🏼

(Navratri) के नौवें और अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री (Maa Siddhidatri) की  पूजा का विधान है। इस दिन को महानवमी (Maha Navami) भी कहते हैं।
मान्‍यता है कि मां दुर्गा का यह स्‍वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है।
कहते हैं कि सिद्धिदात्री की आराधना करने से सभी प्रकार के ज्ञान आसानी से मिल जाते हैं।साथ ही उनकी उपासना करने वालों को कभी कोई कष्ट नहीं होता है. नवमी (Navami) के दिन कन्‍या पूजन (Kanya Pujan) को कल्‍याणकारी और मंगलकारी माना गया है।
पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार भगवान शिव ने सिद्धिदात्री की कृपा से ही अनेकों सिद्धियां प्राप्त की थीं। मां की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए। मार्कण्‍डेय पुराण के अनुसार अनिमा,महिमा, गरिमा,लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वाशित्व ये आठ सिद्धियां हैं। मान्‍यता है क‍ि अगर भक्त सच्‍चे मन से मां सिद्धिदात्री की पूजा करें तो ये सभी सिद्धियां मिल सकती हैं।
मां सिद्धिदात्री का स्वरूप बहुत सौम्य और आकर्षक है। उनकी चार भुजाएं हैं।मां ने अपने एक हाथ में चक्र, एक हाथ में गदा, एक हाथ में कमल का फूल और एक हाथ में शंख धारण किया हुआ है। देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है।💐जय माता दी💐🙏🙏
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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते.
       सुख, शान्ति एवम समृध्दि की  मंगलमयी कामनाओं के साथ 
आप एवं  आप के परिवार जनो को शारदीय नवरात्री की हार्दिक मंगल कामनायें । माँ अम्बे आपको सुख समृद्धि वैभव ख्याति प्रदान करे। जय माँ भवानी।।        

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हमलोग इस महापर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाते है 
मैं इस पर्व को बचपन से बहुत ही लग्न से माँ दुर्गा की सेवा करती हूँ   नोवी दिन नो कन्याऐ ओर एक भैरव जी को अपने घर आमंत्रित करती हूँ और उनको श्रृंगार से सजाती हूँ और प्रसाद का भोग लगाती हूँ  बहुत ही अच्छा और सुखद अनुभव होता है 💃🏼💃🏼💃🏼💃🏼💃🏼
अपने घर मैं भी नो दिन माँ की सेवा ओर व्रत रखती हूँ 
         लेखिका ," रश्मि प्रभाकर"

घुघूतीया

उत्तरांचल का त्योहार घुघुतिया


उत्तराखंड राज्य के कुमाउं में मकर सक्रांति पर “घुघुतिया” के नाम से त्यौहार मनाया जाता है | यह कुमाऊँ का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है और यह एक स्थानीय पर्व होने के साथ साथ स्थानीय लोक उत्सव भी है क्योंकि इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन घुघुत बनाया जाता है जिसे दूध और गुड को आटे में मिलाकर तैयार किया जाता है इस त्यौहार की अपनी अलग पहचान है | इस त्यौहार को उत्तराखंड में “उत्तरायणी” के नाम से मनाया जाता है कई गाँव के आसपास उत्तरायण मेला भी आयोजित किया जाता है l
जबकि गढ़वाल में इसे पूर्वी उत्तरप्रदेश की तरह “खिचड़ी सक्रांति” के नाम से मनाया जाता है | विश्व में पशु पक्षियों से सम्बंधित कई त्योहार मनाये जाते हैं पर कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का यह अनोखा त्यौहार उत्तराखण्ड के कुमाऊँ के अलावा शायद कहीं नहीं मनाया जाता है | यह त्यौहार विशेष कर बच्चो और कौओ के लिए बना है | इस त्यौहार के दिन सभी बच्चे सुबह सुबह उठकर कौओ को बुलाकर कई तरह के पकवान खिलाते है और जब तक कौवा उनका खाना नहीं खाता तब तक कोई खुद भी नहीं खाता.. सुबह सुबह पहाड़ के हर घर से यही आवाज़ आती है.. काले कौआ काले घुघूत मवा खा ले.. अर्थात..काले कौवे घुघूत खा ले.. 
लेखिका , - "मंजू तिवारी"