मंगलवार, 1 मई 2012


आज के इस दिवस पर एक पुरानी रचना
...........समर्पित है ....समस्त श्रमिकों को ...

'वह तोडती पत्थर' ---------'हमेशा प्रासंगिक'


धूल भरी दोपहरी ने 'वह तोडती पत्थर' याद दिला दी
बचपन में जो सिर्फ एक रचना थी, उसकी परिणति हकीकत में करा दी
हाँ मैं हताश ,परेशान बस की आस में थी
नज़दीक एक इमारत अपने पूर्ण होने , के इंतज़ार में थी
कुछ कामगार , अपनी रोज़ी -रोटी की तलाश में थे
बच्चों को धूप में सुला ,उनके भविष्य को संवारने के प्रयास में थे
हाथ , हाथौडी लिए पत्थर नज़र आते थे
आँखों में शाम के चूल्हे के, अंगार नज़र आते थे
सर पर ईंटे , एक नहीं कई थी
आँखें पेड़ के नीचे सोये ,नौनिहाल पर पसरी थी
बच्चे ने करवट ली और पाँव पसार दिए
मेहनती माँ के अधरों पर भी स्मिता ने झंडे गाढ़ दिए
हाथ और क़दमों में तेज़ी आ गयी ...
मस्तिष्क को शायद ख्वाब की कोई झलक पा गयी
हमेशा प्रासंगिक है ये, इसका अंत नहीं होई
कभी इलाहाबाद का पथ और कभी छोटी सी गली कोई

रविवार, 29 अप्रैल 2012

तुम्हारा जाना

‎"जानाँ"
तुम्हारा जाना, 
कहाँ रोक पाई थी तुम्हे, 
'जाने से' 
जी तो बहुत किया, 
हाथ पकड़ कर रोक लूँ तुम्हे, 
क्या करती? 
जिस्म ने जैसे आत्मा का साथ देने से, 
इनकार कर दिया हो.. 
बुत बनी बैठी रही, 
'और तुम ' 
सीढ़ी-दर- सीढ़ी उतरते चले गए, 
दौड़ कर आई छज्जे पर, 
मुझे देख कर मुस्कुरा पड़े थे, 
और हाथ हिला कर 
'विदा लिया'.. 
छुपा गयी थी मैं, 
अपनी आँखों की नमी, 
अपने मुस्कुराते चेहरे के पीछे, 
जानते हो, बहुत रोई थी, 
तुम्हारे जाने के बाद.. 
तुम्हारा फ़ोन आता, 
'पर तुम' 
औपचारिकता निभा कर रख देते, 
"मैं" 
मुस्कुरा पड़ती,
ये सोच कर, के तुम जानबूझकर सता रहे हो, 
कैसा भ्रम था वो? टूटता ही नहीं था, 
लेकिन भ्रम तो टूटने के लिए ही होते हैं न, 
टूट गया एक दिन, मेरा भ्रम भी, 
ख़त्म हो गयीं सारी औपचारिकताएं... 
कितने आसन लफ़्ज़ों में, 'कहा था तुमने', 
"मुझे भूल जाना" 
"जानाँ" 
भूलना इतना ही आसान होता, 
'तो' 
तुम्हारे विदा लेते ही, भूल गयी होती तुम्हे, 
'खैर' 
कभी तो आओगे, 
शायद सामना भी होगा, 
'बस' 
इतना बता देना, 
"मेरी याद नहीं आई कभी?"

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012


मेरे शब्द---------------

शब्द ...मेरे शब्द..!!! कहाँ हो तुम .!....क्यों इतने शैतान हो तुम ......?
कब से गायब हो , मानते हो ना..!!
अपनी अहमियत ,जानते हो ना
मस्तिष्क बिलकुल सूना है ...
मन का दुःख उस से भी दूना है ......
दूर बचपन तक ढूंढ आई
स्म्रति पर जमी हर गर्द हटाई ...
मन के हर कौने,हर आँगन आवाज़ लगाई !!!
लेकिन तुमको नहीं दिया सुनाई .
मुझ को समझो साथ निभाओ
मेरे विचलित विचारों को अपना जामा पहनाओ
आभारी और क्रतग्य रहूंगी
आजाओ अब कुछ नहीं कहूँगी ............:)