शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

जिंदादिल औरतें...

मैं आज नीले अम्‍बर के तले बने इस सखियों के झूले में झूलकर खुद को एक बार फिर उस बचपन में ले जाना चाहती हूं जिसे इस उम्र में आकर वापस जीना एडवेंचर से कम नहीं पुरुषों की तरफ से अकसर यह सुनने में आता है कि औरतों को समझना मुश्किल है पल में माशा पल में तोला वास्‍तव में यदि महिलाओं की मनोस्थिति का अध्‍ययन थोड़ा भी बारीकी से किया जाए तो महिलाएं मुश्किल न लगेंगी मैं भी अपने आस पास देखूं तो मुझे ऐेसे कई चेहरे ध्‍यान में आते हैं जो सिर्फ अपने हंसने-हंसाने के लिए समूह में लोकप्रिय हो जाते हैं।


मेरी कॉलोनी में एक नीलकंठ जी की बहु रहती है। नाम सुनकर लगेगा कि कोई नववधु है, लेकिन अब तो उनकी पुत्रवधु भी नववधु नहीं रही। दादी बन चुकी नीलकंठ जी बहु का चेहरा बड़ा व गोल और रंग पक्‍का है। लम्‍बाई पांच फीट और चौड़ाई कोई दो महिलाओं जितनी। इन सबके बावजूद अगर कुछ आकर्षक और मजेदार लगता है तो वह है उनका मजाक करने के बाद जोरदार अट्टहास करते हुए हो हो करके हंसना। उनका मुझ पर बड़ा प्रेम रहा है। मेरे सुझाव पर उन्‍होंने अपने घर पर एक किटी पार्टी का आयोजन किया। जिसमें मुन्‍नी बदनाम हुई पर नृत्‍य का ऐसा समां बांधा कि हंसते हंसते पेट में बल पड़ने लगे। कुल मिलाकर अनपढ़ होने के बावजूद वे हम कॉलोनी की महिलाओं की मुखियां बनी हुई हैं।


ऐसा ही दूसरा उदाहरण है मेरे पीहर की गली में रहने वाली गोलू की मां का। ठेठ हरियाणवी अंदाज में हंसना और बोलना कि पूरी गली में सुनाई दे। और सुनने को रोचक भी लगे। समय रहते हमारी शादियां हो गई, उधर गोलू गलत संगत में पड़कर अपने अभिभावकों की छांव से इतना दूर चला कि गोलू की मां का अट्टहास भी उसके साथ चला गया।


मेरी अंतरंग सहेली अनुराधा शर्मा का। मेरे साथ बीएड कॉलेज में पढ़ती थी। जहां मैं गंभीर बनी रहती, वहीं वह पूरे समूह में घूमती रहती और अन्‍य छात्राओं में पॉमिस्‍ट के रूप में प्रसिद्ध थी। जब अनुराधा के सामने खुलता तो हर लड़की का हाथ काफी कुछ कहता था। सारी कहानी और सारी समस्‍याएं उसी हाथ में होती। और उसका हल मेरी प्‍यारी सहेली के हाथ में। यह अलग बात है कि यह सिर्फ मैं जानती थी कि अनुराधा को हाथ देखना नहीं आता। पर, हां आंखें पढ़नी जरूरी आती होंगी।


इन तीनों उदाहरणों से मैंने एक बात सीखी, खुद को खुश रखना। यदि मैं ऐसा कर पाती हूं, उसका माध्‍यम चाहे कुछ भी चुनूं, तो समूह या समाज में अपनी अलग ही पहचान बना पाउंगी। जिन महिलाओं ने परिस्थितियों को खुद पर हावी नहीं होने दिया है, वे उन सभी से जुदा हैं जो समस्‍याओं को बड़ा मानकर चलती है और उसी में डूब जाती हैं। 

मै मुस्कुराई हु..

सखी प्रवीणा


बिछड़ के तुझसे..
तेरे 
और करीब आई हु..
डूब के तेरी 
यादो के समंदर में..
कुछ हसीं लम्हे 
चुन के लाइ हु..
इन लम्हों में 
महसूस कर तूझे 
अपने साथ 
देखो ....
आज अरसे बाद
मै मुस्कुराई हु..!  कविता..

"कविता" पे कविता की.."कविता"...!!!



कितने तेरे रूप है कविता...
कितने सारे तेरे रंग...;
हर अहसास को कर आत्मसात
जीबन में पल पल चलती हों संग..!!

दिल से जो देखे..पढे और समझे..
कुछ भी नहीं तुझसे बेहतर..;
खुद को भूल के जीनेवाले..
कर देते अनदेखा तुझ को भी अक्सर..!!!

सागर सी गहराई तुझमे..
उचाईयां तेरी पर्वतो से बढ़कर..;
सुख,दुःख..दर्द ..मौन और आंसू..
तुझमे आते हर शब्द छन-छनकर..!!

कवी ह्रदय की बन प्रियतमा..
तो कभी बन प्रेयसी की हलचल..
बन ममता मात- ह्रदय की..
जीती हों सब की साँसों में हर पल...!!! ...कविता राठी..